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Even if I don't reach all my goals, I've gone higher than I would have if I hadn't set any.

Monday, April 11, 2011

रीड की हड्डी

मैं हूँ उनके साथ,खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

कभी नही जो तज सकते हैं, अपना न्यायोचित अधिकार
कभी नही जो सह सकते हैं, शीश नवाकर अत्याचार
एक अकेले हों, या उनके साथ खड़ी हो भारी भीड़
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

निर्भय होकर घोषित करते, जो अपने उदगार विचार
जिनकी जिह्वा पर होता है, उनके अंतर का अंगार
नहीं जिन्हें, चुप कर सकती है, आतताइयों की शमशीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

नहीं झुका करते जो दुनिया से करने को समझौता
ऊँचे से ऊँचे सपनो को देते रहते जो न्योता
दूर देखती जिनकी पैनी आँख, भविष्यत का तम चीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

जो अपने कन्धों से पर्वत से बढ़ टक्कर लेते हैं
पथ की बाधाओं को जिनके पाँव चुनौती देते हैं
जिनको बाँध नही सकती है लोहे की बेड़ी जंजीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

जो चलते हैं अपने छप्पर के ऊपर लूका धर कर
हर जीत का सौदा करते जो प्राणों की बाजी पर
कूद उदधि में नही पलट कर जो फिर ताका करते तीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

जिनको यह अवकाश नही है, देखें कब तारे अनुकूल
जिनको यह परवाह नहीं है कब तक भद्रा, कब दिक्शूल
जिनके हाथों की चाबुक से चलती हें उनकी तकदीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

तुम हो कौन, कहो जो मुझसे सही ग़लत पथ लो तो जान
सोच सोच कर, पूछ पूछ कर बोलो, कब चलता तूफ़ान
सत्पथ वह है, जिसपर अपनी छाती ताने जाते वीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़


मैं हूँ उनके साथ कड़ी जो सीढ़ी रखते अपनी रीढ़

कभी नहीं जो त्यज सकते हैं अपना न्यायोचित अधिकार
कभी नहीं जो सह सकते हैं सीश नवा कर अत्याचार
एक अकेले हो या उनके साथ कड़ी हो भरी भीड़
मैं हूँ उनके साथ कड़ी जो सीढ़ी रखते अपनी रीढ़

निर्भय हो कर घोषित करते जो अपने उद्गार विचार
जिनकी जिव्हा पर होता हैं उनके अंतर का अंगार
नहीं जिन्हें चुप कर सकती हैं आत तैयो की शमशीर
मैं हूँ उनके साथ कड़ी जो सीढ़ी रखते अपनी रीढ़

नहीं झुका करते जो दुनिया से करने को समझौता
ऊँचे से ऊँचे सपनो को देते रहते जो न्योता
दूर देखती जिनकी पैनी आँख भविष्यत् का तम्चीर
मैं हूँ उनके साथ कड़ी जो सीढ़ी रखते अपनी रीढ़

जो अपने कंधो से पर्वत से बढ़ टक्कर लेते हैं
पथ की बढाओ को जिनके पाँव चुनौती देते हैं
जिनको बाँध नहीं सकती हैं लोहे की बेदी ज़ंजीर
मैं हूँ उनके साथ कड़ी जो सीढ़ी रखते अपनी रीढ़

जो चलते हैं अपने छप्पर के ऊपर लुका धरकर
हार जीत का सौदा करते प्राणों की बाज़ी पर
कूद उददी में नहीं पलट कर फिर जो ताका करते तीर
मैं हूँ उनके साथ कड़ी जो सीढ़ी रखते अपनी रीढ़

जिनको यह अवकाश नहीं हैं देखे कब तारे अनुकूल
जिनको यह परवाह यह नहीं हैं कब तक भद्र कब दिक्शूल
जिनके हाथों की चाबुक से चलती हैं उनकी तकदीर
मैं हूँ उनके साथ कड़ी जो सीढ़ी रखते अपनी रीढ़

तुम हो कौन, कहो जो मुझसे सही गलत पथ लो तोह जान
सोच सोच कर पूछ पूछ कर बोलो कब चलता तूफ़ान
सैट पथ वोह हैं जिस पर अपनी छाती ताने जाते वीर
मैं हूँ उनके साथ कड़ी जो सीढ़ी रखते अपनी रीढ़

Saturday, September 25, 2010

सायद जिन्दगी बदल रही है

जब मै छोटा था, सायद दुनिया बहुत बड़ी हुआ करती थी

मुचे याद है श्कूल से घर तक का रास्ता क्या क्या नही था वहा पे चाट की दुकाने जलेबी ki दुकाने

लेकिन aaj वहा पे फ़ोन शॉप , इंटरनेट kaife आदि है phir भी सब सूना है

सायद दुनिया अब सिमट rhi है

जब मै छोटा tha सामे बहुत लम्बी हुआ करती थी

शाम में क्रिक्केट खेलना घंटो तक पतंगबाजी करना, खो खो खेलना और थक के चूर हो जाना

अब शाम नही होती दिन ढल जाता है और रात हो जाती है

सायद वक्त अब सिमट रही है

जब मै छोटा था सायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी

दिन भर वो हुजूम बना के खेलना साथ साथ रोना साथ साथ हसना लडकियों की बाते करना

अब भी मेरे कई दोस्त है बस फोर्मल ही हेल्लो होता है और अपने रस्ते चल देते है

सायद रिश्ते बदल रहे है

जब मै छोटा था सायद खेल भी अजीब हुआ करते थे

लुका छुपी, खो खो , लाछिक दान , टिप्पी टिप्पी टॉप

अब इन्टरनेट, ऑफिस, फिल्म्स से छूती नही मिलती

सायद जिन्दगी बदल रही है

जिन्दगी का सबसे बड़ा सच यही है जो कब्रिस्तान के बाहर अक्सर बोर्ड पे लिखा मिलता hai

मंजिल तो यही थी बस जिन्दगी गुजर गयी यह आते जाते

सायद समय बदल रहा है

Friday, September 24, 2010

तन्हाई - एक अच्छा दोस्त

मै इस कदर थक गया हू
मै अपनी जिन्दगी से भागना चाहता हू
दूर इतना दूर मै जाना चाहता हू
की कोई देख न ले मुझको
मै तन्हाई से डरता था
लेकिन तन्हाई को अपना दोस्त बनाना चाहता हू
मैंने दोस्त बनाये इंसानों को
कोई समाच न सका मुझे
मै तन्हाई को ये सब समझाना चाहता हू
सायद तन्हाई मेरे बातो को समझ सके
मै यही सब उसे बताना चाहता हू
शहर की इस भागती दौड़ती जिन्दगी
में मै खो सा गया था
मै अब तन्हा अकेला रहना चाहता हू
लोग कहते है तन्हा अकेला नही जिया जा सकता
लेकिन मै उन्हें ये दिखला देना चाहता हू
दोस्त एक एसा हो जो साथ दे हमेशा
कभी अलग न हो मुझसे
इसलिए मै तन्हाई को दोस्त बनाना चाहता हू
इस स्वार्थी दुनिया ने दोस्ती तक को नही छोड़ा
इसलिए मै दुनियावालो से दूर जाना चाहता हू
लोग कहते है दोस्ती सबसे बड़ा रिश्ता होता है
फिर लोग इस पे शक क्यों करते है
इसलिए मै लोगो से दूर जाना चाहता हू
अकेला हू और अकेला रहना चाहता हू
लोग न मुचे समझ सके और न मै शायद लोगो को
और मै ये सब तन्हाई को बताना चाहता हू
अभागा था अभागा हू और सायद अभागा रहूँगा
मै इस अभागेपन से दूर भागना चाहता हू
तन्हाई की न कोई सूरत है न कोई सीरत
फिर कोई kaise chura payega muchse
sayad esliye bhi mai tnhai ko apna dost banana chahta hu
akela hu aur akela rhna chata hu

Thursday, September 2, 2010

सुबह का नमस्कार सभी को

Tuesday, May 18, 2010


Until one is committed
There is hesitancy, the chance to draw back,
Always ineffectiveness.
Concerning all acts of initiative (and creation),
There is one elementary truth,
The ignorance of which kills countless ideas
And splendid plans: That the moment one definitely commits oneself,
Then Providence moves too.
All sorts of things occur to help one
That would never otherwise have occurred.
A whole stream of events issues from the decision
Raising in one's favor all manner
Of unforeseen incidents and meetings
And material assistance,
Which no man could have dreamt
Would have come his way.
I have learned a deep respect for one of Goethe's couplets:
"Whatever you can do, or dream you can, begin it.
Boldness has genius, power, and magic in it."

In my mind

The longer I live, the more I realize the impact of attitude on life. Attitude to me, is more important than facts. It is more important than past, than education, than money, than circumstances, than failures, than successes, than what other people think or say or do. It is more important than appearance, gifted ability, or skill. It will make or break a company, a church, a home.

The remarkable thing is we have a choice everyday regarding the attitude we will embrace from that day. We cannot change our past, we cannot change the fact that people will act in certain way. We cannot change the inevitable. The only thing that we can do is play on the one string that we have and this string is, Attitude. I am convinced that life is ten percent what happens to me and ninety percent how I react to it. And so it is with you....We are in charge of our Attitudes.

Friday, May 14, 2010

Poem

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

चल रहा है तारकों का
दल गगन में गीत गाता
चल रहा आकाश भी है
शून्य में भ्रमता-भ्रमाता

पाँव के नीचे पड़ी
अचला नहीं, यह चंचला है