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Monday, April 12, 2010

लैंगिक भेद पर कब जागेगी चेतना


नई दिल्ली [उमा श्रीराम]। महिला विधेयक ने पुरुषत्व के अभिमान को चूर-चूर कर दिया है। लोग अपना सिर पीट रहे हैं। क्या भारत में वास्तव में लैंगिक समानता होगी? हां बेशक, आज नहीं तो कल जरूर होगी। भारत में अनेक रीति-रिवाज और परंपराएं हैं। पश्चिमी देशों या विकसित देशों के विपरीत हमारे यहां का समाज कई शाखाओं और उप-शाखाओं में बंटा हुआ है। इन विभिन्नताओं के चलते महिलाएं लगातार उपेक्षित होती गई हैं और हम पूर्वाग्रह से दूषित हो गए हैं।

लैंगिक पक्षपात एक वैश्विक घटना है और यह सभी समय और संस्कृति में प्रचलित है। पुरुष हमेशा महिलाओं से भेदभाव करते हैं और उन पर अपना रौब जमाते हैं। भारत में इसी सामाजिक सोच के चलते महिलाएं पिछड़ी हैं।

अस्थिर समाज

महिलाओं के प्रति समाज के भेदभाव को मात्र एक या दो वाक्यों में नही दर्शाया जा सकता है। महिलाओं और लड़कियों के प्रति भेदभाव, जाति व समाज के भेदभाव, गरीबी के कारण शिक्षा से वंचित रखना, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को उपलब्ध न कराना इत्यादि, यह सूची काफी लंबी है। बाल-विवाह, बालिका शिशु हत्या, बालिका भ्रूण हत्या, दहेज हत्या तथा लड़कियों को आर्थिक बोझ समझने जैसी कई कुरीतियां आज भी समाज में मौजूद है। लगातार हो रहे लिंग भेद के कारण अभी तक लाखों बालिकाओं को हम खो चुके हैं।

समाज का यह भेदभाव सरकारी नीतियों में भी दिखता है। सरकार द्वारा महिलाओं की हमेशा उपेक्षा ही हुई है। जबकि महिलाओं के पक्ष में कई नियम-कानून पहले से मौजूद हैं। कुपोषण, अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा की मनाही या उपेछा, काम का भारी बोझ, उत्पीड़न और मूलभूत अधिकारों से वंचित रहने की विवशता जैसे कुछ सरकारी कारण हैं जिस कारण महिलाएं आज भी पिछड़ी हुई हैं। पारिवारिक संपत्ति में भी लडकियों को वंचित रखा जाता है, जिसके लिए कानून में कई तरह की खामियां जिम्मेवार हैं।

हालांकि शहरों में स्थिति ठीक इसके विपरीत है। यहां आर्थिक कारणों से स्त्री-पुरुष दोनों को काम करना पड़ता है। यहां महिलाएं अधिक शिक्षित हैं। यहां परिवार भी छोटा होता है। एक या दो बच्चों के परिवार होते हैं। यहां बेटा हो या बेटी, ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। उच्च शिक्षित महिलाएं अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए अविवाहित रहना पसंद करती हैं।

शहरी महिलाएं ना तो बच्चा पैदा करने की मशीन बनना चाहती है और ना ही विवाहिता होने की गुलामी पसंद करती है। महिला समाज के उत्थान के लिए शहरों में कई विकल्प मौजूद हैं, पर छोटे शहरो में गरीब, मध्यम वर्गीय और उच्च समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव अभी भी एक सामान्य बात है

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