इस पर शर्मिदा होने के पर्याप्त कारण हैं कि शहीदों के गांव में प्राथमिक विद्यालय के कक्षों का नामकरण उनके नाम पर करने का शासनादेश सरकारी फाइलों में धूल खा रहा है। 1998 में जारी इस शासनादेश के तहत सांसदों, विधायकों को बस अपने क्षेत्र के शहीदों के नाम शिक्षा विभाग को भेजने थे, लेकिन न तो उन्होंने इसमें दिलचस्पी दिखाई और न ही शिक्षा विभाग ने। इस पर आश्चर्य नहीं कि अब शिक्षा विभाग के अफसरों को उक्त शासनादेश खोजने पर भी नहीं मिल रहा है। दरअसल जो शासनादेश आधे-अधूरे मन से जारी किए जाते हैं उनका ऐसा ही हश्र होता है। उत्तर प्रदेश में एक लाख से ज्यादा प्राइमरी स्कूल हैं, लेकिन उनमें से किसी एक के भी कक्ष का नाम किसी शहीद के नाम पर नहीं रखा गया। इसका मतलब केवल यही नहीं है कि किसी ने शासनादेश की सुध नहीं ली, बल्कि यह भी है कि शहीदों के सम्मान की परवाह नहीं की गई। यदि की गई होती तो किसी सांसद-विधायक ने तो अपने निर्वाचन क्षेत्र के शहीद का नाम सहेजने का उपक्रम किया ही होता। कहीं ऐसा तो नहीं कि सांसद और विधायक इस शासनादेश से विधिवत रूप से अवगत ही नहीं हो पाए, क्योंकि यह बात गले नहीं उतरती कि सरकारी विद्यालयों के एक भी कक्ष का नामकरण किसी शहीद के नाम पर नहीं किया जा सका। इसी तरह यह भी सहज नहीं जान पड़ता कि किसी भी जिले के शिक्षा अधिकारी ने इसकी परवाह नहीं की कि उनके जिले के शहीदों का स्मरण विद्यालयों के जरिये किया जा सके। जो भी हो, यदि राज्य सरकार इस भूले-बिसरे शासनादेश की तरह अपने राज्य के शहीदों की अनदेखी होते हुए नहीं देखना चाहती तो उसे कोई ऐसी व्यवस्था करनी ही चाहिए जिससे शहीदों को उचित सम्मान मिलने के साथ-साथ उनके परिजनों को समस्याओं का सामना न करना पड़े। यह ठीक है कि दंतेवाड़ा में शहीद राज्य के 40 से अधिक जवानों के परिजनों की मदद करने के लिए केंद्रीय गृहमंत्रालय संकल्पबद्ध है, लेकिन राज्य सरकार को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन शहीदों के परिवार वालों को किसी तरह की समस्याओं का सामना न करना पड़े। पता नहीं क्यों उसकी ओर से ऐसा कुछ नहीं कहा गया जिससे शहीदों के परिवार वालों को यह अहसास होता कि राज्य सरकार भी उनके साथ है।
इस पर शर्मिदा होने के पर्याप्त कारण हैं कि शहीदों के गांव में प्राथमिक विद्यालय के कक्षों का नामकरण उनके नाम पर करने का शासनादेश सरकारी फाइलों में धूल खा रहा है। 1998 में जारी इस शासनादेश के तहत सांसदों, विधायकों को बस अपने क्षेत्र के शहीदों के नाम शिक्षा विभाग को भेजने थे, लेकिन न तो उन्होंने इसमें दिलचस्पी दिखाई और न ही शिक्षा विभाग ने। इस पर आश्चर्य नहीं कि अब शिक्षा विभाग के अफसरों को उक्त शासनादेश खोजने पर भी नहीं मिल रहा है। दरअसल जो शासनादेश आधे-अधूरे मन से जारी किए जाते हैं उनका ऐसा ही हश्र होता है। उत्तर प्रदेश में एक लाख से ज्यादा प्राइमरी स्कूल हैं, लेकिन उनमें से किसी एक के भी कक्ष का नाम किसी शहीद के नाम पर नहीं रखा गया। इसका मतलब केवल यही नहीं है कि किसी ने शासनादेश की सुध नहीं ली, बल्कि यह भी है कि शहीदों के सम्मान की परवाह नहीं की गई। यदि की गई होती तो किसी सांसद-विधायक ने तो अपने निर्वाचन क्षेत्र के शहीद का नाम सहेजने का उपक्रम किया ही होता। कहीं ऐसा तो नहीं कि सांसद और विधायक इस शासनादेश से विधिवत रूप से अवगत ही नहीं हो पाए, क्योंकि यह बात गले नहीं उतरती कि सरकारी विद्यालयों के एक भी कक्ष का नामकरण किसी शहीद के नाम पर नहीं किया जा सका। इसी तरह यह भी सहज नहीं जान पड़ता कि किसी भी जिले के शिक्षा अधिकारी ने इसकी परवाह नहीं की कि उनके जिले के शहीदों का स्मरण विद्यालयों के जरिये किया जा सके। जो भी हो, यदि राज्य सरकार इस भूले-बिसरे शासनादेश की तरह अपने राज्य के शहीदों की अनदेखी होते हुए नहीं देखना चाहती तो उसे कोई ऐसी व्यवस्था करनी ही चाहिए जिससे शहीदों को उचित सम्मान मिलने के साथ-साथ उनके परिजनों को समस्याओं का सामना न करना पड़े। यह ठीक है कि दंतेवाड़ा में शहीद राज्य के 40 से अधिक जवानों के परिजनों की मदद करने के लिए केंद्रीय गृहमंत्रालय संकल्पबद्ध है, लेकिन राज्य सरकार को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन शहीदों के परिवार वालों को किसी तरह की समस्याओं का सामना न करना पड़े। पता नहीं क्यों उसकी ओर से ऐसा कुछ नहीं कहा गया जिससे शहीदों के परिवार वालों को यह अहसास होता कि राज्य सरकार भी उनके साथ है।
ReplyDelete